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ॐ हं हनुमते नमः, को नहीं जानत है जग में प्रभु संकटमोचन नाम तिहारो - ब्लाग चौपाल-राजकुमार ग्वालानी

>> Saturday, June 5, 2010

सभी को नमस्कार करता है आपका राज


दुख में सुमिरन सब करे
सुख में करे न कोय
जो सुख में सुमिरन करे
दुख काहे को होए

वास्तव में इंसान भगवान को तभी याद करता है जब दुख में होता है, अगर हम सुख में भी उस पिता परमेश्वर को याद कर लें तो सच में हमारा दुखों से पाला ही क्यों पड़े। ये बातें हमें इसलिए याद आ रही हैं, क्योंकि आज की चर्चा के समय हमारी नजरें कुछ भगवान की सतुति वाली पोस्ट पर पड़ी और हमने इनको पहले लिया है।

सूर्यकान्त गुप्ता कहते हैं- "ॐ हं हनुमते नमः "
 
"ॐ हं हनुमते नमः "* *विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर श्री रामचरित मानस के पंचम सोपान "सुन्दरकाण्ड" के छंद क्रमांक २ की पहली पंक्ति "बन बाग़ उपबन बाटिका, सर कूप बापीं सोहही "दशानन" की लंका का दृश्य है. व...
मै जैसे ही ध्यान केंद्र के अंदर गया अंदर गुरुदेव की बातें कान में पड़ी . गुरुदेव अनिल से से बातें कर रहे थे . गुरुदेव "सूर्य से तेजस्वी और प्रतापी इस जगत में और कोई नहीं है .सारे ग्रह नक्षत्र उसके...
तुम्हें फूल का खिलना भाता मुझे सुहाता मुरझाना, तुम्हें न भाते साश्रु नयन मुझको न सुहाता मुस्काना ! तुम पूनम की सुघर चाँदनी पर बलि-बलि जाते साथी, मुझको शांत अमावस्या का भाता है यह सूना बाना ! उदित सूर्य 
समापन समारोह के बाद अचानक उत्पन्न खामोशी से हतप्रभ कतिपय मित्रों/शुभचिंतको के मेल प्राप्त होने का सिलसिला मुझे इस पोस्ट के लिए प्रेरित किया, फलत: मुझे ब्लोगोत्सव से संबंधित सार्वजनिक टिप्पणी हेतु बाध्य हो...
जितने समय से भी ब्लोग्गिंग कर रहा हूं , ब्लोग्गिंग की इस अनोखी दुनिया के बहुत सारे रंग रूप और कई तरह के दौर भी देखे और जाने अभी कितने ही देखने बांकी हैं । पिछले दिनों से जो कुछ भी देख पढ रहा हूं , वो कही...
तस्वीरघर में देखें- संगेमरमर की नायाब इमारत की धड़कनें सुनो...
ताज के शहर से हूं। उस शहर से जहां तमाम छतों से ताज नज़र आ जाता है। छोटा सा शहर...छोटी ख़्वाहिशों वाला। अपने में सिमटा। उस दिन ..जिसकी ये तस्वीरें हैं...घर में बैठा हुआ था। अचानक...हल्की बूंदाबांदी हुई...मौ... 
  
फोन पर ज्यादा बातें करना तो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है जी! लेकिन फोन पर लंबी बातें करते हुए लोगों को देख कर मैं अकसर ये सोचता हूं कि ये लोग इतनी देर तक क्या बात करते होंगे? विशेषकर दिल्ली की लडकियां तो फोन पर घंटों बातें करती हुई देखी जाती हैं! उन्हें
  
आँखें तेरे मन का दर्पण ,चहरा खुली किताब का पन्ना ,जो चाहे पढ़ सकता है ,तुझको पहचान सकता है |आँखें है या मधु के प्याले ,पग पग पर छलके जाते ,दो बूँद अगर मैं पी पाता ,आत्म तृप्ति से भर जाता |तेरी आँखों का पानी ,यह सादगी और भोलापन , बरबस खीच लाता मुझको ,कोरे 
पता है साबुन के बुलबुले कैसे बनाते है?पहले हाथी को पानी पिलाओ.... हाँ ये ग्रीन ग्रीन हाथी है... ये ही मेरे लिए बुलबुले बनाता है....फिर उसका ट्रिगर दबाओ....और ये बने बुलबुले....ये रहे इत्ते सारे....मम्मु आपको भी चाहिए... ये लोआपको चाहिए क्या?
  
राजस्थान के कृषि विपणन मंत्री गुरमीत सिंह कुनर का आज जन्मदिन है। उनको बहुत बहुत मंगल कामनाएं। श्री कुनर श्रीगंगानगर जिले के श्री करनपुर क्षेत्र से विधायक चुने गए थे। वे २००८ में दूसरी बार विधायक बने। १९९८ में वे पहली बार विधानसभा पहुंचे।
  
देसी भी हो सकते हैं विलायती से अच्छे.....!
"सुंदर"एक दिन, मार्निंग वॉक के समय, मैने अपने मित्र से कहा, "आजकल बहुत चोरी हो रही है।"उसने कहा, "हाँ, चोरी क्या, सीनाजोरी भी हो रही है।"मैने कहा, "कुछ सलाह दो।"उसने कहा, "एक कुत्ता पाल लो।"मुझे मित्र की सलाह अच्छी लगी. गली में बहुत से कुत्तों के पिल्ले
  
उसने कहा लाल...और मैं लाल हो गया ...उसने कहा पीला ...और मैं पीला हो गया ....वह कहती रही सफेद, हरा, नीला, धामनी, और मैं हर रंग मे रंगता रहा ...वो तो मुझे बाद में समझ आया वो एक कुशल चित्रकार थीजो अपने फायदे के रंग लेकर एक दिन कहीं उड़ गई....
  
जब दिल्ली यात्रा में रायपुर से चले तो ट्रेन में हमें रायपुर का एक नौजवान मिला, जो कि हमारे सफ़र का साथी बना। शाम को इटारसी के पास उसने एक फ़ल निकाला और मुझे भी खाने को दिया, यह फ़ल वैसे तो भारत में समस्त जगहों पर होता है। लेकिन इसे सभी जगह खाया जाता है या
  
दो चार दिनो से मन मे विचार ऊठ रहे थे कि हमारे ब्लांगर मित्र श्री ज्ञानदत्त पाण्डेय जी के बारे मै जानने के लिये मेरे पास ना तो उन का कोई फ़ोन ना० ही है, ओर ना ही ई मेल ,भगवान से यही प्राथना करता हुं वो जल्द ठीक हो कर फ़िर से हमारे बीच आये, अगर किसी के पास
  
हाँ वह परमेश्वर का प्रतीक थी....-देव
एक छोटी बच्ची....अठखेलियाँ कर रही थी...खेल रही थीएक गुब्बारे सेकभी ऊपर उछाल देतीकभी उसे उठाने दौड़ पड़तीकभी पापा को खींचतीकभी चाचू को खींचती....कभी जोर जोर से चिल्लातीतो कभी एकदम चुप हो जाती....उसके खेल में कितनी सजीवता थी...उसके प्रेम में कितनी आत्मीयता
  
काफी दिनों से ख्याल मन दिमाग पर आहट दे कर मुड जाते हैकलम निकाल कर लिखना शुरू करती हूँ कि कुछ काम डायरी को फिर से अलमारी में सजवा देते हैंसोचती हूँ चाँद सितारों से बातें कर लूँथोडा रुक कर अपने दिल से भी कुछ गुफ्तगू कर लूँखुद के बारे में सोचने की कोशिश कर
अच्छा तो हम चलते हैं
कल फिर मिलेंगे 

5 comments:

ललित शर्मा June 5, 2010 at 6:37 PM  

बढिया चर्चा
हार्दिक शुभकामनाएं
पर्यावरण बचाएं
पेड़ लगाएं।

Udan Tashtari June 5, 2010 at 7:16 PM  

बेहतरीन सधी हुई चर्चा..बधाई!!

सूर्यकान्त गुप्ता June 5, 2010 at 8:40 PM  

धन्यवाद! शुभारम्भ हनुमत लला से। अच्छा लगा। वैसे कहीं पर भी हो,चर्चा लेखन मे आपका परिश्रम प्रशन्सनीय है।

संगीता स्वरुप ( गीत ) June 6, 2010 at 3:20 AM  

बहुत अच्छी चर्चा....बहुत से लिंक्स मिले और पढ़े....आभार

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