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दीवानों की नींद उड़ गयी- छोरियां क्या से क्या हो गयी.- ब्लाग चौपाल राजकुमार ग्वालानी

>> Saturday, June 12, 2010

सभी को नमस्कार करता है आपका राज  
 
हर जमाने में छोरियां क्या से क्या हो जाती हैं, लेकिन यह भी तय है कि दीवानों की नींद जरूर उड़ जाती है। लेकिन सोचने वाली बात तो यह है कि आज के जमाने में ऐसे दीवाने हैं जिनकी नींद उड़ जाती है, हां यह तो जरूर है कि छोरियां आज भी क्या से क्या से हो गयी हैं- तो चलिए देखे कि अपने ब्लाग भी क्या से क्या हो गए हैं और कौन से रंगों में खो गए हैं- 
 
 
ज़िन्दगी इक व्यथा हो गयी. प्रीत की दुर्दशा हो गयी. देखते, देखते, देखते... ज़िन्दगी क्या से क्या हो गयी. आया तूफ़ान महंगाई का, सारी खुशियां हवा हो गयी. पीड़ा इतनी बढ़ी अंततः, कुल दिनों की दवा
 
 
मै उजियारा बाँट रहा था मगर हवा को रास न आया * *उसने आँधी को भेजा और मेरा जलता दीप बुझाया* *एक दीप बुझ जाने पर भी हार नहीं मानी मैंने * *फिर से दीप जलाकर मैंने बस आँधी को सबक सिखाया 
 
 
थी कभी छत पर मेरे कुछ धूप आकर तैरती... और नीचे छाँव भी थी सुस्त थोड़ी सी थकी... छाँव के कालीन पर नन्हा खिलौना रेंगता... कुछ उछलती कूदती साँसों को मुझपे फेंकता... हाँ वो बचपन था कभी कुछ झूमता कुछ डोलता......
 
एक चीनी कहावत है-यदि आपको एक दिन की खुशी चाहिए तो एक घंटा ज्यादा सोएं. यदि एक हफ्ते की खुशी चाहिए तो एक दिन पिकनिक पर अवश्य जाएँ.यदि एक माह की खुशी चाहिए तो अपने लोगों से मिलें.यदि एक साल के लिए खुशियाँ चा...
 
मौलिक विज्ञान लेखन* *झूम रहे थे जुगनू नाना* *विश्वमोहन तिवारी*, एयर वाइस मार्शल, (से.नि.) जुगनू का नाम लेते ही मन में एक खुशी की लहर दौड़ जाती है। बरसात की नहाई संध्या की इन्द्रधनुषी मुस्कान या...
 

संगीता पुरी बता रही हैं- खेल खेल में ज्‍योतिष की जानकारी देने का प्रयास - 2
कल के ही लेख को आगे बढाने का प्रयास कर रही हूं , पर एक टिप्‍प्‍णी के कारण शीर्षक में से वैज्ञानिक दृष्टिकोण हटा दिया जा रहा है। जब भी मैं ज्‍योतिष को विज्ञान कहती हूं , उनलोगों को कष्‍ट पहुंचता है , जो मोट...
 
कुछ दिनों पहले मुझे किसी ने एक चुटकुला भेजा जिसे पढ़कर मैं अपनी हंसी रोक ही नहीं पा रही थी भिखारी : बेटी दो दिन से कुछ नहीं खाया, कुछ खाने को दे दे. लड़की: बाबा अभी खाना नहीं बना है. भिखारी:कोई बात नहीं मेर...
 
लटके झटके वाली पोस्ट इक झलक मे भा जाती है* *अब जरूरत क्या है, हो गए हैं हम आज़ाद,* *बलिदानी शहीदों की जरा भी याद नहीं आती है * *गवाह है कल की चली हुई हमारी लेखनी * *जिसने याद किया था उस शहीद को, नाम है करत...
  
बहुत ..बीमार... है ..माँ....आज माँ के पास बैठा ..हूँ.बहुत निकट, उससे एकदम सट कर.तो क्या एक दिन माँ मर जायेगी?क्या माँ फिर नजर नहीं आएगी?ना जाने कैसे मन की बात सुन लिया?वह धीरे ..से ...फुसफुसाई..........,बहुत धीमी मंद आवाज आई.....-"माँ मरती नहीं, कभी मरती
  
जिंदगी एक गधे के साथ भगावन की प्रेमिका के पिता ने भगावन को समझाया, “मैं नही चाहता कि मेरी बेटी पूरी जिंदगी एक गधे के साथ बिताए।” भगावन ने बड़े इतमिनान से जवाब दिया, “बस इसीलिए तो मैं उसे यहां से ले जाने आया हूँ।”
  
सय्यद शहरोज़ कमर, एक बेहतरीन देशभक्त, लेख़क, सम्पादक, का हाल का उनके ताज़ा लेख से लगता है हर कलाकार,लेख़क की कहानी कह रहा है ! प्रकाशकों के अन्याय, आम जनता,और खुद मीडिया की उपेक्षा के शिकार ये कलम के धनी लोग क्या काम करें कि दो जून इज्ज़त के साथ रहना
  
अबे पानी पूरी का का भाव है बे..... आज शाम को गोल गप्पे खाने का मन हुआ तो भाई दो प्लेट गोल गप्पे का ऑर्डर दे दिया गया..... रेट सुन के दिमाग ख़राब..... लो आप भी रेट देख लो और फिर बताओ....अबे हमको याद है बरेली और बनारस का दिन जब एक रुपैया के बारह गोल गप्पे
 
 
अच्छा तो हम चलते हैं
कल फिर मिलेंगे 
 
 
 
 
 
 
 

6 comments:

neha June 12, 2010 at 7:14 PM  

मस्त चर्चा की आपने

rajesh patel June 12, 2010 at 7:16 PM  

आप है चर्चा के राजकुमार

निर्मला कपिला June 12, 2010 at 8:14 PM  

अच्छी लगी चर्चा आभार्

Asha June 12, 2010 at 9:34 PM  

विचारोत्पाद्क चर्चा |अच्छी चर्चा के लिए बधाई |
आशा

ब्लाग बाबू June 12, 2010 at 10:23 PM  

अंकल आप मेरी चर्चा क्यों नहीं करते, मैं राजा बाबू हूं ।

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