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ए का जिनिस ए, कनफुजिया गए है-ब्लाग चौपाल- राजकुमार ग्वालानी

>> Monday, June 7, 2010

सभी को नमस्कार करता है आपका राज
 
 सुबह-सुबह एक खबर के लिए जाना है, ऐसे में आज चर्चा को सीधे अंजाम देते हैं और चलकर देखते हैं कौन क्या कहता है-
 
 
आनी बानी के बियन्जन अउ ओखर नाव। काला बचांव अउ काला खांव. एखरे ऊपर एक किस्सा के सुरता आगे. एक झन गवैंहा हा हलवाई के दुकान माँ जाथे अउ कई परकार के चीज माढ़े रथे ओमा ले एक मा इशारा करके पूछथे जी. ए का जिनिस ...
   
एक था मुन्ना , एक थी नन्हीं नट्खट मुन्ना, चंचल नन्हीं भाई बहन में कभी न बनती सुबह शाम झगड़े में कटती नए नए खिलौने आते मुन्ने को फिर भी न भाते तोड़-फोड़ करता था मुन्ना फिर भी था मम्मी का बन्ना नन्हीं की थी बस इक गुड़िया वही थी उसकी बस इक दुनिया नन्हे
  
आज एक छोटी सी कहानी कुछ अलग तरह की... रीना ज़िंदगी मुकम्मल तो कभी भी नहीं थी। बचपन से आज तक कहीं न कहीं, कोई न कोई कमी लगातार बनी रही। बाबा कितनी जल्दी हमें छोड़कर चले गए। अर्थाभाव भी हमेशा ही बना रहा। हाँ, ज़िंदगी कितनी अधूरी थी इसका अहसास उससे मुलाक़ात
   
उर्वशी और मेनका जैसी अप्सराओं के मिथकों, सिंधु घाटी की सभ्यता से मिले अवशेषों में पायी गयी यक्षिणी की मूर्ति और अजंता एलोरा की गुफाओं में सदियों से अपने विलक्षण सौन्दर्य की झलक दिखाती यक्षिणी तक ढेरों उदाहरण पाये जाते हैं भारत में, जबकि नारी सौन्दर्य की
  
सत्य की उपलब्धि के नाम पर ( a poem by ravi kumar, rawatbhata) सत्य कहते हैं ख़ुद को स्वयं उद्‍घाटित नहीं करता सत्य हमेशा चुनौती पेश करता है अपने को ख़ोज कर पा लेने की और हमारी जिज्ञासा में अतृप्ति भर देता है कहते हैं सत्य बहुत ही विरल है उसे खोजना अपने आप
  
पति -हर सफल पुरूष के पीछे एक स्त्री होती है.पत्नि (चिढकर)-हां, और यह भी जान लो हर असफल स्त्री के पीछे एक पुरूष होता है.
  
हाँ........!! लगता तो ऐसा ही है कि प्रकाश  झा जी थोड़े कन्फ्यूजन में है.             वास्तव में प्रकाश झा जी को को समाज के वस्तविक ज्वलंत मुद्दों पर फिल्म निर्माण के लिए जनता जानती है. लेकिन शुक्रवार को रिलीज हुई
 
भोपाल गैस काण्ड ................... आज हुई है सजा.............. पूरे पच्चीस साल बाद................ क्या इसी को इन्साफ कहते हैं? इन्साफ के लिए क्या इतने वर्षों का इंतज़ार सही है? यही लोकतंत्र की शक्ति कहला...
 
कुछ सुनती, कुछ कहती बातें. खामोशी से बहती बातें. हाय, ज़माना देख-देख कर, मन भीतर ही रहती बातें. सच कहना तो मुश्किल है भई, मुझको अक्सर कहती बातें. उन्हें समझना कठिन नहीं रे, सीमा में जो रहती बा...
 
हँस रही हैं मुश्किलें, फेल हुआ तंत्र है, ये कैसा गणतंत्र है, ये देश का गणतंत्र है| झूठ के बाजारों में बिक रहा 'स्वतन्त्र' है, ये कैसा गणतंत्र है, ये देश का गणतंत्र है| बढ़ रही महंगाई , आम जन हुआ परतंत्र ह...
 
23 साल की मुकदमेबाज़ी....हजारों लोगों की मौत और सज़ा सिर्फ दो साल.....अरे इससे ज्यादा साल तो मुकदमा चला है......आखिर क्यों.....क्या चूक रह गयी कि भोपाल की जिस यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से रिसी गैस ने हजारों...
 
दो नई कविताएँ * *(१)* *हिंसा की देवी, तुम सुन रही हो न..? * * * *हिंसा की देवी, * *तुम सुन रही हो न..? * * * *जब तुम अपने कोमल होंठों से गाती हो * *हिंसा के गीत * *तब लगता है, एक सुन्दर फूल* *काँटों के सा...
 
डॉ.सत्यजीत साहू  कहते हैं- सरकती जाये है रुख से नकाब आहिस्ता आहिस्ता
 
आज रविवार का दिन है. आज "*सन डे सत्संग*" का दिन है . आज ध्यान केंद्र में भोजन में खिचड़ी और आमलेट बनाना तय हुआ है .मै आवश्यक सामग्री लेकर ध्यान केंद्र पहुँच गया हूँ .मेरे बाद डाक्टर अनिल वास्ती आये . मैने...
 
टिप्पणियाँ पाना भला किसे अच्छा नहीं लगता? ऊपर-ऊपर से भले ही हम कहें कि हम टिप्पणियों की परवाह नहीं करते पर जब हम अपने भीतर झाँकते हैं तो लगता है कि हमें भी टिप्पणियाँ पाने में खुशी होती है। *हिन्दी ब्लोगिं..
 
 
 अच्छा तो हम चलते हैं
कल फिर मिलेंगे
 
 
 
 
 
 
 
 
 

4 comments:

Udan Tashtari June 7, 2010 at 6:06 PM  

बढ़िया चर्चा...सही लिंक्स मिले!

मनोज कुमार June 7, 2010 at 6:46 PM  

अच्छी चर्चा।

संगीता पुरी June 7, 2010 at 8:16 PM  

संक्षिप्‍त पर अच्‍छी चर्चा !!

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