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चिट्ठा जगत स्वचलित या हाथ चलित, उखाड़ लो, जो उखाड़ सकते हो !!!-ब्लाग चौपाल- राजकुमार ग्वालानी

>> Monday, November 22, 2010

सभी को नमस्कार करता है आपका राज  
 
हम नहीं चाहते थे कि चिट्ठा जगत के बारे में हम फिर से लिखें, लेकिन क्या करें जब कोई इंसान मेहनत करता है और उसकी मेहनत पर लगातार पानी फेरने का काम किया जाता है तो उस इंसान का खफा होना लाजिमी होता है। हमारे ब...
 
मैं भ्रष्ट हूँ, भ्रष्टाचारी हूँ जाओ, चले जाओ तुम मेरा, क्या उखाड़ लोगे ! चले आये, डराने, डरता हूँ क्या ! आ गए, डराने, उनका क्या कर लिया जो पहले सबकी मार मार कर धनिया बो-और-काट कर चले गए ! चले आये मुंह उठाकर...
 
अज्ञानमानमिह नाक्षमतीन्द्रियं हि ज्ञानं निरूपकममुष्य तथानुभूतेः । अज्ञापयच्च तदिदं न तु(ननु) तन्निरूप्य- भावेन तत्प्रथयितुं न भवेत्समर्थम् ॥८१॥ नाप्यन्यदस्ति किमपि प्रकटानुभूता- वस्येति तन्निजमते प...
 
एक सुनहरा नगमा 1 नैन मिले चैन कहां - बसंत बहार जमाना था 1956 का जब एक फिल्म आई थी बसंत बहार, जिसने हर गली मोहल्ले में अपनी पैठ बनाई। संगीत के पंडितों से लेकर आम आदमी तक समान लोकप्रियता अर्जित की कारण था

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने मजदूरों के कल्याण के लिए गठित किये जाने वाले बोर्डों के बारे में लापरवाही करने के मामले में केंद्र सरकार को सख्ती से कहा है कि यदि वह अपना दायित्व पूरा कर पाने में असफल रहती है ...
 
*आज की युवापीढ़ी एक खास तरह की मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक समस्या से ग्रसित नज़र आ रही है.... वो है उग्रता । ऊँची आवाज़ में बात करना ...... किसी भी इंसान का किसी भी बात पर मजाक बनाना...दूसरों को नीचा दिखाना...
 
सत्येन्द्र झा कार्यालय के सभी कर्मचारी-अधिकारी विलम्ब से कार्यालय आते थे। लोगों को बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। एक दिन जब आक्रोश बहुत बढ़ गया तो लोगों ने उस कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारी से भें...
 
कभी-कभी ज़िन्दगी थम सी जाती है, ऐसी जगह ले आ जाती है जहाँ हम रोज़मर्रा के कामों इतना मशगूल हो जातें हैं की आगे बढ़ना भूल सा जाते हैं. वही रोज़ खाना पकाना, बच्चों को पढ़ाना, या दफ्तर का काम, बस यही रह जाता ...
 
भारत आने की तैयारी से बच्चों में उत्साह और उत्सुकता पूरे सबाब पर है, इधर हमारी तैयारियाँ जोरो पर हैं तो उधर भारत में घरवाले भी हर पल इन्तजार में पलक पांवड़े बिठाकर बैठे हैं ! भारत आने का दुःख भी होता है क्...
 
हम सभी सामाजिक प्राणी है और हमें समाज के सहयोग की आवश्यकता हर पल पडती है |हमारा सबसे पहला साबका अपने पडौसी से ही पडता है|हमारे सुख-दुःख का सबसे पहला गवाह पडौसी ही हुआ करता है | हमने तो यह भी देखा है पडौसी ...
 
स्‍वागत करें छत्‍तीसगढ़ से नई हिन्‍दी ब्‍लॉगर डॉ.ऋतु दुबे जी का
मैंने एम.पी.एड., एम. ए. (हिंदी), किया है, राज्‍य प्रशासनिक सेवा से चयनित होकर महाविद्यालय मे कार्यरत हूं, मैने शारीरिक शिक्षा विषय मे अपना शोध प्रबंध पूरा कर पं. रविशंकर शुक्‍ल विश्वाविद्यालय से डॉक्टरेट 
 
तुम कैसे हो? दिल्ली में ठंड कैसी है? ....? ये सवाल तुम डेली रूटीन की तरह करती हो, मेरा मन होता है कह दूं- कोई अखबार पढ लो.. शहर का मौसम वहां छपता है और राशिफल भी.... मुझे तुम पर हंसी आती है, खुद पर ...
 
समय, काल, परिस्थितियों के साथ-साथ पत्रकारिता की परिभाषा भी बदली है। उसका रूप, रंग और उद्देश्य ने भी करवट ली है। जिस पत्रकारिता का जन्म कभी 'मिशन' के तौर पर हुआ माना जाता था और जिसने अपनी महत्ता समाज़ की बुर...
 
 
अच्छा तो हम चलते हैं
कल फिर मिलेंगे 
...
 
 
 
 
 
 
 

4 comments:

डॉ॰ मोनिका शर्मा November 22, 2010 at 11:16 PM  

सभी लिनक्स शानदार ...सुंदर सजी चौपाल ... ...मेरी पोस्ट ' उग्रता बनाम दृढ़ता ' को जगह देने के लिए धन्यवाद

वन्दना November 23, 2010 at 2:17 AM  

बहुत बढिया लिंक्स लगे हैं।

Dr. shyam gupta November 23, 2010 at 7:00 AM  

अच्छी चौपाल है भाई...

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