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लौट आये फिर मुद्दतों के बाद , कुछ ही.....ही, हा......हा, हो जाए-ब्लाग चौपाल- राजकुमार ग्वालानी

>> Sunday, July 18, 2010

सभी को नमस्कार करता है आपका राज

 
आज सीधे चर्चा की तरफ चलते हैं-.....
 
ला में जुड़ जाती है एक और कड़ी. *(२)* रिश्तों में खटास पैदा होने में नहीं लगती देर लगा दिए जाते हैं सगे सम्बन्धियों पर आरोप कही सुनी बात...
 
ये थका-थका सा है जोश मेरा, ये ढला-ढला सा शबाब है तेरे होश फिर भी उड़ गए, मेरा हुस्न क़ामयाब है ये शहर, ये दश्त, ये ज़मीन तेरी, हवा सरीखी मैं बह चली तू ग़ुरेज न कर मुझे छूने की, मेरा मन महकता गुलाब है ...
 
उन पत्थर के पशुओं पर लाहनत है, जो दूसरों के दुःख को कोमलता से अपनाकर द्रवीभूत नहीं हो जाते *-हिल * डूबने वाले के प्रति सहानुभूति का मतलब उसके साथ डूबना नहीं है बल्कि ख़ुद तैर कर उसको बचने ...
 
बार-कोड मेरी पलकों के बार-कोड ने कल जब बहुत शोर मचाया था अपने बार-कोड रीडर से तुमने, फ़ौरन मुझे पढ़वाया था एक्सपायरी डेट पास जान जश्न खूब मनाया था एक्सपायरी डेट निकल गयी तो क्या, मैं नयी पैक...
 
कब कहाँ कैसे हम उलजकर रह चले थे जिंदगी की राहमें , जब आया होश तो तनहा ही चल रहे थे एक सुनी सड़क पर , कारवां छुट चूका था कहीं दूर और हम बेखबरसे चल पड़े , बस तब ये हो गया हमें तुम्हारी यादने सताया यूँ जी भर के म...
 
 रविवार का दिन है, आईए कुछ ही..ही.., हा..हा.. हो जाए @ भाषण चल रहा था। नेताजी बार-बार कह रहे थे कि हमें अपने पैरों पर खड़े होना है। तभी भीड़ के पीछे से कोई चिल्लाया, अरे साहब हम तो कब से कोशिश कर रहे हैं पर...
 
राजकुमार सोनी कहते हैं- हाथियों ने मचाया हाहाकार
छत्तीसगढ़ में केवल नक्सली ही हाहाकार नहीं मचाते। नक्सलवाद की चुनौती का सामना करने वाला यह राज्य हाथियों की समस्या से भी बुरी तरह जूझ रहा है। कैप्टन जे फारसाइथ के अनुसार छत्तीसगढ़ में हाथियों की उपस्थिति क...
 
 
सियासत खून पीती है हमारा तो ग़लत क्या है दरख्ते ज़िन्दगी पर बेल हमने ख़ुद चढ़ाई है कभी ये शेर कहने वाले कवि और शायर डा.त्रिमोहन तरल की गजलें साखी पर 
 
शबनम खान की- दौर-ए-उलझन
दौर उलझनों का* *सुलझता ही नहीं...* *वक़्त की रफ़्तार* *बढ़ती भी नहीं...* *धुंध में लिपटी* *ख्वाहिशें सभी...* *ज़िन्दग़ी का सफ़र* *काटे कटता नहीं...* *चन्द रोज़ पहले* *ख़ामोश जज़्बात हुए...* *पर ...
 
 
(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)* वज्र से भी कठोर, फूल से भी कोमल, क्या केवल भगवान ही है? नहीं, इसी स्वभाव का एक सभ्य प्राणी- मेरे घर में भी है; जिसकी आवाज ऐसी है जैसे चल रही हो बन्दूक दुनाली, आप शौ...
 
अच्छा तो हम चलते हैं
कल फिर मिलेंगे 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

4 comments:

Udan Tashtari July 18, 2010 at 8:18 PM  

सही चौपाल सजी!

वन्दना July 18, 2010 at 11:00 PM  

बहुत बढिया चौपाल सजाई है।

शिवम् मिश्रा July 19, 2010 at 1:10 AM  

बढिया चौपाल सजाई आपने राज भाई , बधाई हो बधाई !

'अदा' July 19, 2010 at 4:26 PM  

kya baat hai...
are ham to kahte hain kamaal hai..

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