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अभिमान के मद में डूबे मतवालों की दुर्गति ही होती है , ये पतित पावन है या रावण ...-ब्लाग चौपाल- राजकुमार ग्वालानी

>> Saturday, August 21, 2010

 सभी को नमस्कार करता है आपका राज
इस दुनिया में कुछ लोग महज काड़ीबाज होते हैं। जिनके पास कोई काम नहीं होता है, वे दूसरों के काम में टांगे अड़ाने का काम करते हैं। ब्लाग जगत में ऐसे गंदे लोगों की कमी नहीं है जो बिनावजह ब्लागरों को परेशान करने का काम करते हैं। ऐसे लोगों का इलाज इसलिए नहीं है क्योंकि अपने गूगल बाबा ने फर्जी आईडी बनाने पर खुली छूट दे रखी है। खैर जिसकी जैसी मानसिकता वह वैसा ही काम करेगा, हमारा धर्म है अपना काम करना सो हम अपना काम कर रहे हैं।आज छुट्टी के दिन देखें हमारे किस ब्लागर मित्र ने क्या रचा है अपने ब्लाग में....
एक नारियल के पेड़ में सबसे ऊँचे स्थान पर एक नारियल लगा था . पेड़ के किनारे एक नदी बहती थी और उसके किनारे पर एक पत्थर पड़ा था . उस पत्थर को देखकर नारियल ने कहा - अरे तुम्हारी भी क्या जिंदगी है पड़े पड़े हर कि...
हमारे ब्लाग में कोई बंदा काफी समय से पतित पावन के नाम से फर्जी आईडी बनाकर कुछ भी अनाप-शनाप टिप्पणियां कर रहा है। इनकी टिप्पणियों से ही परेशान होकर हमें मॉडरेशन का सहारा लेना पड़ा। इसके पहले भी कई ऐसे बेशर्...
संजीव शर्मा कहते हैं- यार हद होती है चापलूसी की भी.... 
क्या होता जा रहा है हमारे मीडिया को? खबरें खोजने की बजाये हमारे पत्रकार महिमामंडन या कटु परन्तु सीधी-सपाट भाषा में कहें तो चापलूसी पर उतर आये हैं.क्या राहुल गाँधी का एक पोलीथीन का टुकड़ा उठाकर कचरापेटी में ...
पीप्ली लाईव का हिरो नत्था।द रियल हिरो आफ़ सिल्वर स्क्रीन।नत्था यानी ओम्कार दास माणिकपुरी आज चर्चा का केन्द्र है।उसने अभिनय के झण्डे गाड़ दिये हैं।स्वाभाविक अभिनय क्या होता है दुनिया को बता दिया है नत्था ने।
यह एक संयोग मात्र है कि मैंने और गिरिजेश जी ने आज ही पीपली लाईव फिल्म देख ली बिना एक दूसरे को बताये और प्लान बनाये .वे तो फिल्म की रिव्यू से हाथ खीच लिए हैं और मैं भी यह पुनीत कार्य करने में इसलिए असमर्थ प...
nice वाले सुमन जी ने मुँह खोला। सारे रिकार्ड तोड़ते हुए सुमन जी ने मेरे ब्लॉग पर एक शेर कहा, आप भी गौर फरमाएँ :- गाँधी के सपनो का यह भारत, यही स्वराज्य का मूल मन्त्र है। सौगंध तुम्हे सत्ताधीशों, सच बतलाओ यह...
गिरिजेश राव कहते हैं- शाबास रिज़्वी दम्पति!
अभी अभी पीपली लाइव देख कर लौटा हूँ। फिल्म समीक्षा नहीं आती। इसलिए सिर्फ दर्शक की दृष्टि से बताऊँगा। बहुत पसन्द आई। कहीं कहीं गहराई देनी थी लेकिन फिल्म तेजी से बढ़ गई। की गल नइँ जी। शाबास रिज़्वी दम्पति! श...
विश्वनाथ त्रिपाठी * * * इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि ग्रामीण जन-जीवन और किसानों की समस्या पर आजकल हमारे साहित्यकारों और पत्रकारों का कम ही ध्यान जाता है। बड़ी तेजी से हो रहे शहरीकरण के बावजूद भारत की अधि...
इस महत्वपूर्ण परिचर्चा के सातवें दिन का पटाक्षेप हिंदी के बहुचर्चित व्यंग्यकार श्री प्रेम जनमेजय जी से करने जा रहा हूँ , तो आईये उनसे पूछते हैं क्या है उनके लिए आज़ादी के मायने ?* बहुत गहरे मायने हैं हमार...
जब हम उनसे जुदा हो रहे थे सच पूछो तो फ़ना हो रहे थे खुशियों की बातें तो क्या कीजियेगा आंसू भी हमसे जुदा हो रहे थे लहू के जो कतरे बचे थे बदन में वोह जोशे-जिगर से रवां हो रहे थे कहाँ मिल पाएं है आशिक जहा...
भार्या से प्रेयसी बनने की संपूर्ण चेष्टाओं को धूल- धूसरित करती तुम्हारी हर चेष्टा जैसे आंदोलित कर देती मन को और फिर एक बार नए जोश से मन फिर ढूँढता नए -नए आयाम प्रेयसी के भेदों को टटोलता खोजता हर बार ए...
वाह भाई! सरकार हो तो ऐसी हो! छत्तीसगढ़ की सरकार ने विधानसभा तक में कह दिया कि छत्तीसगढ़ से कोई पलायन नहीं होता। सरकार के इस दावे के पीछे तर्क था कि वह यहां के लोगों को न केवल दो रूपये किलो चावल दे रही है बल्कि...
 अच्छा तो हम चलते हैं
कल फिर मिलेंगे

3 comments:

patit pawan August 21, 2010 at 10:39 PM  

ग्वालानी जी पता नहीं किस टिप्पणी पर नाराज होकर इतनी सख्त बात कह रहे हैं। इससे मेरे दिल को ठेस लगी है। ना हम अभिमान में डूबे हैं ना कोई टंगड़ीबाज़ हैं। लेकिन फिर भी वो नाराज़ हुए हैं तो अवश्य कोई ना कोई बात तो होगी ही। वादा है कि हम आज के बाद उनके ब्लॉग पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे। ग्वालानी जी का कहना है कि ब्लॉग जगत में भाई चारा बढ़ाने और समाज सेवा के लिये आये हैं, और हम उनके इस धर्मयुद्ध में कोई बाधा नहीं डालना चाहते हैं। फिर एक बार माफी चाहते हैं कि उनको हमारी वजह से इतना बुरा लगा।

अनामिका की सदायें ...... August 22, 2010 at 11:39 AM  

अच्छी चर्चाएँ की हैं.

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